बरेली। पशुपालन और डेयरी क्षेत्र में बरेली ने एक बड़ी उपलब्धि दर्ज की है। यहां आयोजित कैटल जीनोमिक्स समिट 2026 के दौरान भारत के पहले जेनेटिकली सेलेक्टेड एलीट गिर बछड़ों का लाइव जन्म हुआ। इसे देश में उन्नत पशु आनुवंशिकी और स्वदेशी नस्ल सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
बरेली स्थित बीएल कामधेनु फार्म्स में 14 और 15 सितंबर को आयोजित कैटल जीनोमिक्स समिट में पशुओं की नस्ल सुधार से जुड़ी आधुनिक तकनीकों का प्रदर्शन किया गया। इस दौरान जेनेटिक्स, आईवीएफ, एम्ब्रियो ट्रांसफर और सेक्स्ड सीमेन जैसी तकनीकों के इस्तेमाल पर भी चर्चा हुई।
40 से 60 लीटर दूध उत्पादन का लक्ष्य
जेनेटिकली सेलेक्टेड एलीट गिर गायों को लेकर सबसे खास बात उनके संभावित दुग्ध उत्पादन को लेकर है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वैज्ञानिक ब्रीडिंग और बेहतर आनुवंशिक चयन के माध्यम से ऐसी गायों को विकसित करने का लक्ष्य है, जिनसे प्रति दिन 40 से 60 लीटर तक दूध उत्पादन हासिल किया जा सके। हालांकि, यह आंकड़ा चयनित आनुवंशिकी वाली गायों के लिए लक्ष्य/अनुमान के रूप में बताया गया है। वास्तविक दूध उत्पादन पशु की आनुवंशिक क्षमता के साथ-साथ उसके आहार, स्वास्थ्य, देखभाल और प्रबंधन पर भी निर्भर करेगा।
जीनोमिक चिप से होगी बेहतर पशुओं की पहचान
समिट में ऑप्टिमाइज्ड बोवाइन एसएनपी जीनोमिक चिप का भी प्रदर्शन किया गया। इसके जरिए पशुओं के डीएनए में मौजूद हजारों आनुवंशिक मार्करों का आकलन कर उनके संभावित गुणों की पहचान की जा सकती है। इससे अधिक दूध उत्पादन, बेहतर प्रजनन क्षमता, तेज विकास, स्वास्थ्य, गर्मी सहन करने की क्षमता और रोग-प्रतिरोध जैसे गुणों वाले पशुओं का चयन आसान हो सकता है। इस तकनीक को आईवीएफ, भ्रूण प्रत्यारोपण और सेक्स्ड सीमेन जैसी तकनीकों के साथ जोड़कर उन्नत आनुवंशिकी को तेजी से आगे बढ़ाने की योजना है। इससे पारंपरिक प्रजनन प्रक्रिया की तुलना में बेहतर आनुवंशिक गुणों वाले पशुओं की संख्या बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
2027 तक हर महीने 15 हजार भ्रूण तैयार करने का लक्ष्य
बरेली स्थित लीड्स जेनेटिक्स सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में 2027 के अंत तक हर महीने करीब 15 हजार भ्रूण तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए आईवीएफ-ईटी लैब, जीनोमिक्स लैब, इंटीग्रेटेड ब्रीड इम्प्रूवमेंट फार्म और अन्य आधुनिक सुविधाओं को एक साथ विकसित करने की योजना बताई गई है।
इस पहल का उद्देश्य केवल दूध उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि स्वदेशी नस्लों के संरक्षण के साथ उनके आनुवंशिक गुणों में वैज्ञानिक सुधार करना भी है। बरेली में हुए इस प्रयोग को भारत में पशुधन की उत्पादकता बढ़ाने और डेयरी किसानों की आय को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

